September 19, 2010

ए खुदा ,तू खैरियत से तो है?













तेरे  नाम  पर  इक  मस्जिद  गिरती  है
तेरे  नाम  पर  इक  मन्दिर  बनता  है
तेरे  नाम  पर  ऐ  ज़िन्दगी  के दाता  
मौत  का  बर्बर  खेल  चलता  है |

तू  रिश्ते  जोड़ता  है
लोग  दिल  तोड़  देते  हैं
तू  प्यार  सिखाता  है
लोग  नफरत  घोल  देते  हैं |

तू  निराकार  है
तेरे  अक्स  पर  झगडे  होते  हैं
तू  पालनहार  है
लोग  तुझे  ही  तोल  देते  हैं |

तेरे  नाम  पर  बाती  जलती  है
तेरे  नाम  पर  घाटी  सुलगती  है
तेरे  नाम  पर  बनी  रिवायतों  पर
अक्सर  ही  रूह  बिलखती  है |

दर्द  होता  होगा  तुम्हें ,देखकर  यह  सब
आँखें  नम  हो  जाती  होंगी  अक्सर  तुम्हारी
ए खुदा  ,तू  खैरियत  से  तो  है ?
तेरी सलामती की दुआ अब मैं किस्से मांगूँ?

~Saumya

August 02, 2010

हो सकता है...




















हो  सकता  है
जब  कभी  तुम  बेहद  उदास  हो
मैं  ना  रहूँ  तुम्हारे  पास
मेरे  कन्धों  पर , सर  रखकर  रोने  को |
हो सकता है 
जब  कभी  अकेले  में  तुम  सिसक  रही हो
मैं  ना  रहूँ  तुम्हारे  पास
तुम्हारे आंसूं  पोछने  को |
हो  सकता  है
अगर  कभी  तुम्हे  चोट  लगे
मैं  ना  रहूँ  तुम्हारे पास
तुम्हारे  ज़ख्म  पर  प्यार  से  फूंकने  को |
हो  सकता  है
जब  कभी  तुम  परेशान  हो
मैं  ना  रहूँ तुम्हारे पास
तुम्हे  गले  से  छपटाकर
’सब  ठीक  हो  जाएगा ’ कहने  को |
हो  सकता  है
जब  कभी  तुम  हार  कर  टूटने  लगो
मैं  ना  रहूँ  तुम्हारे  पास
तुम्हे  हौसला  देने  को |
हो  सकता  है
जब  कभी  अकेले  में  तुम  डर  जाओ
मैं  ना  रहूँ  तुम्हारे  पास
तुम्हारा  हाथ  पकड़ने  को|
हो सकता है.................

तो  कभी मायूस  मत  होना 
एहसास  कर  लेना
मेरे  होने  का
दोहरा  लेना
मेरी  कही  हुई  बीती  बातें
समझा  लेना  खुद  को
जैसे  मैं  समझाती  थी  तुम्हे
लड़ना  अपनी  कमजोरियों  से
और  फिर  छू लेना  आसमां  को
जीत  लेना  जहां  को!

मैं  तुम्हारे  ’पास ’ हर  वक़्त  ना  सही
तुम्हारे  ’साथ ’ हमेशा  हूँ !

~Saumya

July 19, 2010

तुम्ही तो हो!



















जैसे पंखुड़ियों के आँचल से लिपटी
कोई ओस की बूँद
जैसे दिल के तार छेड़ती
कोई मीठी सी धुन |
जैसे चेहरे पर खिली
मासूम सी हँसी
जैसे गोकुल के गलियारों में
कृष्णा की बंसी |
हाँ,तुम्ही तो हो! 

जैसे बुझते दिए को बचाती
कोमल हथेलियाँ
जैसे  दूर किसी गाँव में
सरसों की फलियाँ |
जैसे गोधुली बेला में
वो पहला सितारा
जैसे झरनों में झिलमिलाती
कोई चमकती धारा |
हाँ,तुम्ही तो हो! 

जैसे बिन मांगे पूरी हुई
कोई मनचाही मुराद
जैसे सब खोने के बाद भी
एक छोटी सी आस |
जैसे सुबह सुबह देखा
कोई सुन्दर सपना
जैसे परायों की भीड़ में
सिर्फ कोई अपना |
हाँ,तुम्ही तो हो!  

जैसे सांसों में घुलती 
हरसिंगार की महक
जैसे दिनों बाद आँगन में
पाखियों की चहक |
जैसे ठंडी ठंडी सी बयार 
और गुलाब के बगीचे 
जैसे नदियों का कल-कल
और सावन की झींसें |
हाँ,तुम्ही तो हो!  

जैसे छत पर बैठा 
परिंदों का जोड़ा 
जैसे घर की देहलीज़ पर 
तितलियों का डेरा |
जैसे आँखों से छलकते
ख़ुशी के आंसू 
जैसे मंद-मंद- मुस्कुराती 
बासंती ऋतू |
हाँ,तुम्ही तो हो! 

जैसे चुनिन्दा शब्दों से गुथी 
कोई प्यारी-सी कविता 
जैसे रौशनी बिखेरती 
निश्छल सविता | 
जैसे खुदा का भेजा 
कोई अनमोल फरिश्ता 
खुशियाँ बाँटता जो 
आहिस्ता-आहिस्ता |
हाँ,तुम्ही तो हो! 

जैसे हाथों पर लिखी
भाग्य की लकीर
जैसे दुआएं देता
कोई अनजाना फकीर |
जैसे कड़ी धूप के बाद 
सुहावनी सी शाम
जैसे ज़िन्दगी  का ही
कोई दूसरा नाम |
हाँ,तुम्ही तो हो!
सिर्फ तुम्ही तो हो! 




गोधुली बेला=when day and night meet just after the sunset,पाखियों=birds,सविता=sun

June 23, 2010

इस बार जब सावन...

 
















इस बार जब सावन चुपके से
मेरी खिड़की पर दस्तक देगा
तो  अँधेरे कमरों से निकल
मैं बावली सी दौड़कर
पहुँच जाउंगी छत पर |

भीगने दूँगी कुम्हलाई रूह को
बाहर से भीतर तक
भीतर से बाहर तक |

पथराई आँखों को
नम होने दूंगी
पराये अश्कों से ही सही |

इन्द्रधनुष से कुछ रंग उधार लेकर,
रंग लूँगी 
बेरंग हुए सपनों को |

थकी हुई साँसों को
फिर ताज़ा कर लूँगी
धरती की सौंधी  महक से |

बरखा की रिमझिम को धीमे से गुनगुनाउंगी,
हवाओं की ओढनी ले,हौले से झूम जाउंगी,
और फिर खुशदिल होकर
जब दोनों हाथों को आगे फैलाउंगी
तो चंद बूँदें
मेरी हथेलियों पर आकर ठहर जायेंगी
और हर बार की तरह इस बार भी
कुछ नया लिखेंगी
कुछ अलग  ....
इस बारी ,शायद कुछ अच्छा ! :)

~Saumya