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August 31, 2012

गुब्बारे-वाला


अभी-अभी सड़क किनारे
रंग-बिरंगे दो गुब्बारे फूटें हैं।

मोटर गाड़ी में बैठा

तकरीबन चार साल का बच्चा
एक हाथ में लॉलीपॉप है जिसके
नयी यूनिफ़ॉर्म में अपनी जो बौहत फब रहा है
पहला गुब्बारा..... उसी का फूटा है।
माँ ने लाडले की फ़रमाइश पर
बड़े शौक से दिलाया रहा होगा
स्कूल गेट से बाहर निकलते वक़्त।
 पेचीदगियां तमाम हैं आसपास
कुछ न कुछ गलती से चुभ गया होगा।
बच्चा सुबक-सुबक कर रो रहा है
खेलने का सामान चाहिए उसको
माँ पुचकारते हुए चुप करा कर कहती है
अगले चौराहे पर दूसरा दिला देगी !

एक गुब्बारे-वाला है

उम्र उसकी लगभग छह बरस होगी
बच्चा कहूँ उसे या नहीं इस कश्मकश में हूँ ......बहरहाल
माथे पर तमाम सिलवटें हैं उसके
नंगे पाँव .....फटे पुराने कपड़ों में
रंगीन सपने बेचता है हर रोज़
छोटे तीन रुपये के ....बड़े पांच रुपये के।
दूसरा गुब्बारा उसी का फूटा है 
सूइयाँ .......दिल में चुभी हैं
और जो फूटा है ......वो दरअसल नसीब है
 रोया पर वो बिल्कुल नहीं है 
जानता है शायद   
आँखों के पानी से ना भूख की आग बुझेगी ना जीने की प्यास ।
आवाज़ सुनते ही दूर अब्बा ने जोर से फटकार लगायी
"कमबख्त! पूरे पाँच रुपये का नुक्सान कर दिया
एक और गया तो खैर नहीं"।
गुब्बारे-वाले ने हमउम्र बच्चों को
आइस-क्रीम खाते देखा
अपना दूसरा हाथ ख़ाली पेट पर रखा
फिर कुछ सोचकर जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गया
"बाबु जी गुब्बारे ले लो ......दीदी जी गुब्बारे ले लो "

अगले चौराहे पर खिलौने और मिल जायेंगे बेशक

बावरा बचपन पर कहो कैसे मिलेगा?
अगले चौराहे पर होटों की हँसी भी हासिल हो जाएगी यकीनन
 मुँह के निवाले के लिए पर ..... ना जाने कितने शहर अभी और पार करने पड़ेंगे।
..........................................................................................................................
मोटर गाड़ी वाले बच्चे को जल्दी चुप कराओ कोई 
गुब्बारे-वाले की दबी चीखें शायद सुनाई दे जाएँ थोड़ी !

~Saumya

June 13, 2012

आँखों से थोड़ी बारिश हो..














सूखे हुए बेजान ख्वाब सारे
दफन हैं रूह की..... कमज़ोर बुनियाद पर 
......................................................
आँखों से थोड़ी बारिश  हो
तो दिल को यकीं आये
कि पल्कों की डाली पर
इक नया ख्वाब 
फिर 'हरा' होगा कभी.....................

~Saumya

December 20, 2010

आड़ी-तिरछी रेखाएं















मैं जब छोटी थी ना
तो अक्सर .......बड़े शौक से 
कुछ टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें
बनाती रहती थी 
घर की दीवारों पर
और माँ..... हमेशा की तरह...... डांट देती थी
"मत कर बेटा ,दीवारें..... खराब हो जाएँगी!!"
मैं अब....... समझदार हो गयी हूँ  |

पर ऐ खुदा
तू क्या..... अभी तक नादान है
जो आड़ी-तिरछी रेखाएं
गढ़ता रहता है
हम सब की...... हथेलिओं पर
कभी कटी कभी पूरी 
कभी आधी-अधूरी
क्या तेरी माँ........ डांटती नहीं तुझे
"मत कर बेटा,जिंदगियां .... ख़राब हो जाएँगी.....!!"


~Saumya

October 12, 2010

टूटे ख़्वाब....


हर शाम छत पर
जब अश्कों की आँच में
टूटे ख़्वाबों को
जलाती है वो 
तो धधकने लगती है
ख्वाहिशों की लौ!

सिहरती हवाओं का इक हुजूम
उड़ा ले जाता है संग
चंद अंगारों को
और फेंक देता है
किसी आसमां के सीने पर!

बच्चे खुश होते हैं
उन 'तारों' को देखकर
मुसाफिरों को मंजिल मिल जाती है
स्याह 'रात' जगमगा उठती है
और लोग
उन दम तोड़ते सुलगते अरमानों से भी
मन्नते मांग लेते हैं !

किसी को किसी के अंधियारों से
क्या फर्क पड़ता है ..............!!

~Saumya

November 04, 2009

बदलाव.....

एक  नन्ही  सी  बूँद
जो  उठी  थी  उर  से
अथाह  सागर के ,
का  स्वाद  चखा  था  मैंने 
तनिक  नमकीन  थी|
उड़  चली थी 
कुछ  सहमी  हुई  सी ,
कुछ  बहकी  हुई  सी ,
सूरज  के  प्यासे  अधरों   से
अपनी  नमी  छिपाती हुई ,
मलिन हुई  फिजाओं  से
अपनी  निवेदिता  बचाती हुई ,
तलाश  रही  थी 
अपना  खोया  अस्तित्व |
देखो  गगन  को  छूकर
उसके  गलियारों   में  रंग  भरकर
फिर  वापस  आई  है......
तृषित कंठों   को  तर  करने ,
बंजर  धरा  की गोद  भरने ,
हथेलियों  पर   मृदंग  करती ,
संग  पर  नए  छंद लिखती |
फिर  चखा  स्वाद  मैंने …….
और  आश्चर्य  हुआ  इस  नयी  अनुभूति  पर
की  बूँद  अब  मीठी हो  चुकी  थी |

बदलता  तो  है  मनुज  भी
शिखर को  छूकर
फिर  बदलाव  मनुज  में  ही क्यूँ
विपरीत  होता  है …………………

~सौम्या 


September 26, 2009

अँधेरे बाँटने को...........













आज फिर विभावरी की सेज पर,
जब चाँदनी इठला रही थी ,
तभी तारों का एक जमघट
व्योम की परिधि फांदकर ,
बादलों से लड़-झगड़कर,
मेरी खिड़की पर आ बैठा,
और पुकारने लगा,
मानो माँ का कोई झिलमिलाता आँचल,
चार पहर के विरह के बाद,
मुझे आलिंगन में लेने को,
व्याकुल हो रहा हो ।


मैं भी रोज़ की तरह  ,
अपनी एकाकिता के कमरे से निकल ,
अम्बर के उस अपरिमित समुच्चय को,
संजो रही थी ,
अपनी भीगी-भीगी सी नम आखों में |
कालिमा के घेरों में लिपटी वह हर एक बिंदु ,
टिम-टिम करती ,सिसकियाँ भर रही थी,
सुलग रही थी ,
अभियन्तर,
और भीतर ,
धधक रही थी,
उदासी परोसते उन गलियारों को
रोशन कर रही थी |
कि तभी टूट कर बिखर गया एक तारा 
यकीनन,किसी ने कुछ माँगा होगा |


फिर भी वह विमलाभ-कान्ति,
शांत है ,
निस्पंद है ,
और आंसुओं का बांध टूटता भी है
तो कभी धरा की प्यास बुझाने को,
कभी बरबस ही मन को रिझाने को 
ऐसी मूक शहादत
भला कौन यहाँ देता है....
कौन कहाँ  देता है......


अभी भी झाँक रहा है,
वो जमघट मेरे आँगन में,
भेद रही हैं उसकी शीतल किरणे,
मेरे अंतरतम को,
मानो अँधेरे बांटने को ,
कोई साथी मिल गया हो......... 


~सौम्या